Home व्रत और त्यौहार Jitiya Vrat Katha | जितिया व्रत कथा, जीमूतवाहन की कथा

Jitiya Vrat Katha | जितिया व्रत कथा, जीमूतवाहन की कथा

326
0
SHARE

Jitiya Vrat Katha | जितिया व्रत कथा

Jitiya Vrat Katha, जितिया व्रत कथा, जितिया व्रत, जितिया, व्रत कथा, कथा, व्रत, गरुण, Jivitputrika Vrat Katha, जिउतिया व्रत, जीमूतवाहन

Jitiya Vrat Katha : जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत हिन्दू धर्म में बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता हैं| जिसे अपनी संतान की मंगल कामना के लिए किया जाता हैं| इस दिन निर्जला उपवास किया जाता हैं| इसे तीन दिन तक मनाया जाता हैं| इस व्रत को माताए अपनी संतान के उज्जवल भविष्य और लम्बी आयु के लिए रखती हैं| हिन्दू पंचांग के अनुसार यह व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक मनाया जाता हैं| जिसमे पहले दिन नहाये खाये, दूसरे दिन निर्जला व्रत तथा तीसरे दिन व्रत का पारण किया जाता हैं| यह पर्व बिहार व उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं|
जीवित्पुत्रिका-व्रत के साथ जीमूतवाहन की कथा जुड़ी है। जो इस प्रकार है –
गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। वे राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वहीं पर उनका मलयवती नामक राजकन्या से विवाह हो गया। एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी. इनके पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया – मैं नागवंशकी स्त्री हूं और मुझे एक ही पुत्र है। पक्षिराज गरुड के समक्ष नागों ने उन्हें प्रतिदिन भक्षण हेतु एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा की हुई है। आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है। जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा – डरो मत. मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा. आज उसके बजाय मैं स्वयं अपने आपको उसके लाल कपडे में ढंककर वध्य-शिला पर लेटूंगा. इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपडा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर गरुड बड़े वेग से आए और वे लाल कपडे में ढंके जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड के शिखर पर जाकर बैठ गए। अपने चंगुल में गिरफ्तार प्राणी की आंख में आंसू और मुंह से आह निकलता न देखकर गरुडजी बड़े आश्चर्य में पड गए। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा. जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया. गरुड जी उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राण-रक्षा करने में स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए. प्रसन्न होकर गरुड जी ने उनको जीवन-दान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दे दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन के अदम्य साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई और तबसे पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई।
आश्विन कृष्ण अष्टमी के प्रदोषकाल में पुत्रवती महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर माता पार्वती को कथा सुनाते हुए कहते हैं कि आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर जो स्त्री सायं प्रदोषकाल में जीमूतवाहन की पूजा करती हैं तथा कथा सुनने के बाद आचार्य को दक्षिणा देती है, वह पुत्र-पौत्रों का पूर्ण सुख प्राप्त करती है। व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है। यह व्रत अपने नाम के अनुरूप फल देने वाला है।
आशा है कि आप सभी को यह Jitiya Vrat Katha, जितिया व्रत कथा का लेख पसंद आया होगा| इस आर्टिकल को अधिक से अधिक फेसबुक और व्हाट्सप्प पर शेयर करें और आपका कोई सुझाव हो तो हमें कमेंट करके अवश्य बताये| इसी तरह के पोस्ट पढ़ने के लिए हमें सब्सक्राइब करें|

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here