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जितिया और जीवित्पुत्रिका व्रत की चील और सियारिन की कथा | Jitiya Vrat Katha Hindi

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जितिया और जीवित्पुत्रिका व्रत की चील और सियारिन की कथा | Jitiya Vrat Katha Hindi

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Jitiya Vrat Katha Hindi :- नर्मदा नदी के पास कंचनबटी नाम का नगर था | वहां का राजा मलयकेतु था | नर्मदा नदी के पश्चिम दिशा में मरुभूमि थी, जिसे बालुहटा कहा जाता था | वहां विशाल पाकड़ का पेड़ था | उस पर चील रहती थी | पेड़ के नीचे खोधर था, जिसमें सियारिन रहती थी | चील और सियारिन, दोनों में दोस्‍ती थी | दोनों ने एक बार कुछ स्त्रियों को जीवित्पुत्रिका व्रत करते देखा तो स्वयं भी इस व्रत को करना चाहा।
 
दोनों ने एक साथ इस व्रत को किया और फिर दोनों ने भगवान जीऊतवाहन की पूजा के लिए निर्जला व्रत रखा | व्रत वाले दिन उस नगर के बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गयी | अब उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया |
 
काली रात हुई और घनघोर घटा बरसने लगी | कभी बिजली कड़कती तो कभी बादल गरजते | तूफ़ान आ गया था | सियारिन को अब भूख लगने लगी थी | मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया | पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया |
 
फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया | उनके पिता का नाम भास्कर था | चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई | सिया‍रन, छोटी बहन के रूप में जन्‍मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया | उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई | अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए, पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे |
 
कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए | वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे | कपुरावती के मन में उन्‍हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी | उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए | उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया |
 
यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया | इससे उनमें जान आ गई | सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए | जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए | दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी | जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी | वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी |
 
जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई | अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था | भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं | वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी, और उसे सारी बातें बताईं | कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई | जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया |
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